Posted By:- Lukesh Dewangan
Posted On:- 28-Jan-2026

पुरी शंकराचार्यजी का उन्नीस दिवसीय छग प्रवास राजनांदगांव से प्रारंभ

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

रायपुर। ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज माघ मेला महोत्सव प्रयागराज के पश्चात छत्तीसगढ़ प्रदेश में अपने राष्ट्रोत्कर्ष अभियान के अंतर्गत आज सुबह सारनाथ एक्सप्रेस से दुर्ग रेल्वे स्टेशन पहुंचे। यहां भव्य स्वागत पश्चात कड़ी सुरक्षा के बीच वे सड़क मार्ग से राजनांदगांव के पाटीदार भवन पहुंचे , जहां पर उनका दो दिवसीय प्रवास निर्धारित है। प्रवास के पहले दिन आज सायं छह बजे महाराजश्री के दर्शन के साथ उनका आध्यात्मिक संदेश भी सुलभ हुआ। इसी कड़ी में दूसरे दिन 29 जनवरी को प्रात:कालीन सत्र में दर्शन , दीक्षा तथा हिन्दू राष्ट्र संगोष्ठी में धर्म , अध्यात्म तथा राष्ट्र से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान पूज्य शंकराचार्यजी के श्रीमुख से प्राप्त हो सकेगा। वहीं सायं सत्र में शंकराचार्यजी सड़क मार्ग द्वारा राजनांदगांव से दुर्ग के अंडा स्थित शैल देवी महाविद्यालय पहुंचेंगे जहां पर शंकराचार्यजी के सानिध्य में भारतीय ज्ञान परम्परा - विज्ञान और वेदान्त का संवाद विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त होगा। यहां आयोजन कार्यक्रम की समाप्ति पश्चात 01 फरवरी को महाराजश्री का रायपुर स्थित श्री सुदर्शन संस्थानम , रावांभाठा में मंगलमय पदार्पण होगा , जहां पर 15 फरवरी तक उनका प्रवास रहेगा। उपरोक्त अवधि में 02 फरवरी से 15 फरवरी तक प्रात: एवं सायं के सत्रों में संगोष्ठी तथा दर्शन का सौभाग्य उपस्थित भक्तवृन्दों को प्राप्त हो सकेगा। यहां आयोजित सभी कार्यक्रमों के पश्चात महाराजश्री 16 फरवरी को राष्ट्र रक्षा अभियान के अगले चरण के लिये प्रस्थान करेंगे। उक्ताशय की जानकारी श्री सुदर्शन संस्थानम , पुरी शंकराचार्य / मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने दी। पूज्य शंकराचार्यजी अपने समसामयिक उद्बोधन में कारक कोटि के व्यक्तियों के संबंध में उद्घृत करते हैं कि कारक - कोटी के जो व्यक्ति होते हैं , वो शब्दब्रह्म - परब्रह्म में निष्णात होने पर भी उनको जो दायित्व प्राप्त होता है कटनी - छंटनी आदि का , उसमें वो संलग्न रहते हैं। उपशम उनके जीवन में बाहर से परिलक्षित नहीं होता। लोकसंग्रह में लगे हुये महानुभाव तो सबके हित का मार्ग प्रशस्त करते ही हैं , कारक - कोटि के जो महानुभाव होते हैं ; परशुरामजी इत्यादि , वो कटनी - छंटनी इत्यादि में भी संलग्न रहते हैं। ठीक इसी तरस हिन्दूओं की वर्तमान स्थिति तथा मनवांक्षित मानसिकता के संदर्भ में संकेत करते हैं कि आज का हिन्दू शास्त्र और धर्म को तभी तक मानता है जब तक शास्त्र और धर्म उनके मन के अनुकूल हों। जैसे ही प्रतिकूल हुये , हिन्दू तुरंत बोलेगा मैं नहीं मानता ऐसे शास्त्र और धर्म को। यही आस्था है धर्म में। आप शास्त्र के अनुसार ना चलकर शास्त्रों को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं ये कौन सी निष्ठा है ? कल को भगवान आपकी इच्छा के विरुद्ध हो जाये तो आप ईश्वर पर भी प्रश्न कर देंगे। आप शास्त्र तथा धर्म नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रह तथा इच्छा में आस्थान्वित हैं।