Posted By:- Lukesh Dewangan
Posted On:- 31-Jan-2026

माघी पूर्णिमा पर किये गये कार्य होते हैं विशेष फलदाई

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

प्रयागराज। हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ माह में पड़ने वाली पूर्णिमा तिथि को माघ पूर्णिमा कहते हैं। पंचांग के अनुसार माघ पूर्णिमा की तिथि 01 फरवरी को सुबह 05 बजकर 52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 02 फरवरी की सुबह 03 बजकर 38 मिनट पर होगा। ऐसे में माघ पूर्णिमा का व्रत और स्नान - दान दोनों ही 01 फरवरी यानि आज ही किया जायेगा , क्यंकि आज सूर्योंदय के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी। ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस बार की माघ पूर्णिमा को बेहद शुभ माना जा रहा है। रविवार के दिन पूर्णिमा का संयोग बन रहा है और इसके साथ कई खास योग भी बन रहे। सर्वार्थसिद्धियोग , प्रीति योग , आयुष्मान योग , पुष्य नक्षत्र और रवि पुष्य योग जैसे संयोग इस दिन को और भी महत्वपूर्ण बना रहे हैं। इन योगों के कारण इस दिन किये गये धार्मिक कायों को विशेष फलदायी माना जा रहा है। धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस तिथि पर स्नान , दान और जप को बहुत पुण्य फलदायी बताया गया है। माघ माह में चलने वाला यह स्नान पौष मास की पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक होता है। तीर्थराज प्रयाग में कल्पवास करके त्रिवेणी स्नान करने का अंतिम दिन माघ पूर्णिमा ही है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माघ स्नान करने वाले मनुष्यों पर भगवान माधव प्रसन्न रहते हैं तथा उन्हें सुख-सौभाग्य , धन-संतान और मोक्ष प्रदान करते हैं।
माघ पूर्णिमा का महत्व-मघा नक्षत्र के नाम से माघ पूर्णिमा की उत्पत्ति होती है। मान्यता है कि माघ माह में देवता पृथ्वी पर आते हैं और मनुष्य रूप धारण करके प्रयाग में स्नान , दान और जप करते हैं। इसलिये कहा जाता है कि इस दिन प्रयाग में गंगा स्नान करने से समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में लिखे कथनों के अनुसार यदि माघ पूर्णिमा के दिन पुष्य नक्षत्र हो तो इस तिथि का महत्व और बढ़ जाता है। पद्मपुराण में उल्लिखित है कि किसी और महीने में जप , तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते , जितने कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि अनेक प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में वैकुण्ठ को पाने का आसान रास्ता माघ पूर्णिमा के पुण्य स्नान को बताया गया है।‌ विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में उल्लेख है कि इन दिनों में अनेक तीर्थों का समागम होता है। माघ पूर्णिमा पर स्नान , दान , हवन, व्रत और जप किये जाते हैं। इस दिन भगवान विष्णु का पूजन , पितरों का श्राद्ध और गरीब व्यक्तियों को दान देना चाहिये।
माघ पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि -माघ पूर्णिमा के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी , जलाशय , कुआं या बावड़ी में स्नान करना चाहिये। स्नान के बाद सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुये सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिये। स्नान के पश्चात व्रत का संकल्प लेकर भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिये। मध्याह्न काल में गरीब व्यक्ति और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देना चाहिये। दान में तिल और काले तिल विशेष रूप से दान में देना चाहिये , माघ माह में काले तिल से हवन और काले तिल से पितरों का तर्पण करना चाहिये। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार हमारे यहां माघ में कल्पवास की परंपरा है। इसका अर्थ है कि एक महीने तक हजारों लोग संगम किनारे रहकर व्रत और रोज संगम में स्नान करते हैं। इनमें साधु-संतों के अलावा कुछ आम लोग भी संगम जाकर व्रत करते हैं। तीर्थराज प्रयाग में एक मास तक कल्पवास करने वाले व्रतियों का माघी पूर्णिमा के दिन ही उपवास खुलता है और उनके व्रत का समापन होता है। सभी कल्पवासी माघी पूर्णिमा पर माता गंगा की आरती पूजन करके साधु सन्यासियों और ब्राह्मणों को भोजन करवाते हैं। जो भी सामग्री उनके पास शेष रह जाती है वो उसका दान कर देवी गंगा से फिर बुलाने का निवेदन कर अपने घर जाते हैं।