Posted By:- Lukesh Dewangan
Posted On:- 04-Jun-2026

’पारंपरिक खेती छोड़ अपनाया वैज्ञानिक दृष्टिकोण: केरलापाल के कालेंद्र कुमेटी बने किसानों के रोल मॉडल’

नैनो डीएपी और नैनो यूरिया के उपयोग से बचा रहे हैं जमीन की उर्वरता, विविधीकरण से बदली किस्मत’

रायपुर,  छत्तीसगढ़ के दूरदराज के गांवों में अब आधुनिक और वैज्ञानिक खेती की बयार बहने लगी है। इसकी जीती-जागती मिसाल पेश की है, ग्राम केरलापाल के प्रगतिशील किसान कालेंद्र कुमेटी ने। कभी पारंपरिक खेती के कारण आर्थिक तंगी और बढ़ती लागत से जूझने वाले कालेंद्र आज अपनी मेहनत, नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बल पर न केवल आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के युवाओं और किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं।

संघर्ष से सफलता तक का सफर-   कुछ वर्ष पहले तक कालेंद्र कुमेटी भी अन्य किसानों की तरह पारंपरिक ढर्रे पर खेती कर रहे थे। लागत लगातार बढ़ रही थी और उत्पादन उस अनुपात में बेहद कम हो रहा था, जिससे परिवार का गुजारा मुश्किल था। लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने लीक से हटकर कुछ नया करने की ठानी। उन्होंने कृषि विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और आधुनिक कृषि तकनीकों की बारीकियों को समझा।

’नैनो टेक्नोलॉजी और समन्वित कृषि पर फोकस’-  कालेंद्र की सफलता का सबसे बड़ा राज रासायनिक खादों का अनियंत्रित उपयोग बंद कर वैज्ञानिक विकल्पों को चुनना रहा। उन्होंने बताया कि फसल उत्पादन के लिए नैनो डीएपी और नैनो यूरिया का उपयोग सबसे बेहतर है। इससे न केवल फसलों को भरपूर पोषण मिलता है, बल्कि जमीन की प्राकृतिक उर्वरकता (उपजाऊ क्षमता) भी नष्ट नहीं होती।  इसके अलावा, उन्होंने अपनी आय बढ़ाने के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग (समन्वित कृषि) को अपनाया। धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ वे अब सब्जियों, फलदार पौधों की खेती, पशुपालन, मछली पालन और उद्यानिकी (भ्वतजपबनसजनतम) भी कर रहे हैं।

’जल संरक्षण और मिट्टी परीक्षण को दी प्राथमिकता-    कालेंद्र अपने खेतों में पानी की हर बूंद का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली (टपक सिंचाई) का उपयोग कर रहे हैं। इससे पानी की भारी बचत हो रही है और पौधों को जरूरत के अनुसार ही नमी मिल रही है। वे नियमित रूप से अपने खेतों का मिट्टी परीक्षण करवाते हैं, ताकि जमीन में जिस पोषक तत्व की कमी हो, केवल वही खाद दी जा सके।